पश्चिम बंगाल

इस जिस्मगाह में सुबह लगता है किबातों का बाजार, शाम ढलते ही…

डेस्क: देश में एक ऐसा भी बाजार (जिस्मगाह) है, जहां सुबह किताबें और शाम ढलते ही जिस्म का सौदा शुरू हो जाता है यानी इस बाजार में भविष्य निर्माण और स्त्री विनाश की दो कड़ियां एक साथ चलती है.

दरअसल, ये बाजार महाराष्ट्र उस पुणे शहर में है, जिसे आज रोजगार हब के तौर पर जाना जाता है. पुणे के बुधवार पेठ इलाके में एक दिन में एक ही जगह पर दो तरह का बाजार लगता है.

इस बाजार में सुबह किताबें बिकती हैं तो शाम ढलते ही जिस्मफरोशी का धंधा शुरू हो जाता है. हालांकी, कोरोना संक्रमण के कारण इस बाजार को सरकारी निर्देश के बाद कुछ माह के लिए जरूर बंद कर दिया गया था, लेकिन इसके खुलते ही फिर से बाजार में दोहरे दृश्य देखने मिले.

जिस्मगाह

ये है एशिया का दूसरा सबसे पुराना रेडलाइट एरिया
असल में ये बाजार कोलकाता के सोनागाछी के बाद एशिया का दूसरा सबसे पुराना रेड लाइट एरिया है. यहां दिन में किताबों का बड़ा बाजार लगता है तो शाम ढलते ही किताबों की जगह खूबसूरत नार ले लेती हैं.

पुणे का बुधवार पेठ इलाका शहर का सबसे बड़ा व्यावसायिक केंद्र भी है. यहां इलेक्ट्रॉनिक और किताबों की कई दुकानें हैं. भीड़-भाड़ वाला इलाका होने के कारण शाम को जब ये दुकानें बंद हो जाती है तो ये गलियां रेडलाइट एरिया के रूप में गुलजार हो जाती है.

अब मिली सुकून…

भीड़ का आलम यह होता है कि इन गलियों में पैदल चलना भी मुश्किल होता है. सेक्स वर्कर्स के हितों के लिए काम करने वाली पुणे की एनजीओ सहेली ने यहां एक सर्वे किया था.

सर्वे के मुताबिक इस रेडलाइट एरिया में तकरीबन 400 कोठे हैं. यहां एक महिला यौनकर्मी 836 के छोटे-छोटे कमरों में अपने परिवार के साथ जीवन काट रही है.

इन बदनाम गलियों में घुसने के लिए सिर्फ पांच फीट चौड़ी सड़क है. इस इलाके में लकड़ी और कंक्रीट के बने पुराने घर देखने को मिल जाएंगे. शाम के बाद इन जर्जर मकानों की सीढ़ियों पर मेकअप कर खड़ी लड़कियां पूरी रात नजर आती हैं.

बिल गेट्स भी कर चुके हैं यहां का दौरा

गौर हो कि पेठ की गलियों में साल 2008 में माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भी आ चुके हैं. यहां करीब एक घंटे रहते हुए उन्होंने कई कॉमर्शियल सेक्स वर्करों से मुलाकात की थी और उनसे एड्स समेत यौन जनित रोगों के बारे में चर्चा भी की थी.

गेट्स की संस्था की ओर से सेक्स वर्कर्स के बच्चों के भविष्य निर्माण को 200 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान भी दिया गया था. लेकिन कोरोना संक्रमण के दौर में यहां की यौनकर्मियों की स्थिति ऐसी रही, मानों पेट ने कभी रोटी ही न देखी हो.

ऊपर से सूबे की सरकार की अनदेखी ने उन्हें मौत के दहलीज पर पहुंचाने का काम किया. लेकिन अब चोरी छिपे ही सही कुछ हद तक यहां रौनक लौटी है. इस रेडलाइट एरिया में बड़ी संख्या में नेपाली और बंगाली लड़कियों के साथ ही कुछ बिहार की भी लड़कियां देह व्यापार में संलिप्त हैं.

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