राष्ट्रीय

ब्रिटिश पुलिस की आंखों के सामने गवाह को मारी गोली, खुद गले में फंदा डाल बोले ‘डोंट ब्लैकेन माइ फेस’

डेस्क: खुदीराम की शहादत के बाद देश के लिए मर-मिटने देशभक्त युवाओं में जुनून सवार हो गया था. कन्हाई लाल दत्त भी उनमें से एक थे. वह खुदीराम के बाद फांसी पर चढ़ने वाले दूसरे आंदोलनकारी थे. फांसी पर चढ़ते वक्त उन्होंने अंग्रेजों से कहा, ‘डोंट ब्लैकेन माय फेस’ (मेरा चेहरा काला मत करना) और ऐसा ही हुआ. उनके चेहरे को काले कपड़े से नहीं ढका गया. 10 नवंबर 1908 को अलीपुर जेल में उन्हें 20 वर्ष की उम्र में फांसी दी गयी.

बताया जाता है कि उन्होंने फांसी फंदे को खुद से गले में डाल दिया था और अंतिम सांस तक सामने खड़े अंग्रेज अफसर की आंखों में आंखे डाल कर देशवासियों के क्रोध और देशप्रेम के जज्बे का इजहार करते रहे. बताया जाता है कि फांसी से एक दिन पहले जब जेल के वार्डन ने कन्हाई को हंसते हुए देखा तो कहा, ‘अभी तुम मुस्कुरा रहे हो, लेकिन कल सुबह यह मुस्कान तुम्हारे होठों से गायब हो जायेगी.’ जब दूसरे दिन उन्हें फांसी के लिए ले जाया गया तब भी वह मुस्कुरा रहे थे.

उन्होंने जेल वार्डन से मुस्कुराते हुए पूछा, ‘अब आपको मैं कैसे दिख रहा हूं?’ और इस सवाल के बाद अंतिम सांस तक वह जेल वार्डन को घूरते रहे. बाद में इसी जेल वार्डन ने प्रोफेसर रॉय से कहा था, ‘अगर कन्हाई जैसे 100 वीर भी आपको मिल जाये तो आपको आपका लक्ष्य पाने से कोई नहीं रोक सकता.’

जन्माष्टमी की रात जन्मे तो नाम पड़ा ‘कन्हाई लाल’

जन्माष्टमी की काली अंधियारी रात में उनका जन्म हुआ था, इसीलिए ‘कन्हाई लाल’ नाम रखा गया. 30 अगस्त 1888 को उनका जन्म हुगली जिले के चंदननगर में हुआ था. उनके पिता चुन्नीलाल ब्रिटिश सरकार के नौसेना विभाग में एकाउंटेंट थे. वह बंबई में कार्यरत थे. इसीलिए परिवार भी वहीं ले गये थे. कन्हाईलाल की प्राथमिक शिक्षा वहीं आर्य शिक्षा सोसाइटी स्कूल में हुई. इसके बाद वह चंदननगर लौट आये. हुगली के डुप्ले कॉलेज में भर्ती हुए, वहां प्रोफेसर चारूचंद्र रॉय के क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव उन पर भी पड़ा. बंगाल विभाजन के खिलाफ कन्हाई ने चंदननगर से आंदोलन का मोर्चा निकाला. इससे कॉलेज ने उनकी ग्रेजुएशन की डिग्री रोक ली. 1908 में पढ़ाई पूरी कर वह कोलकाता चले गये. यहां पर वह जुगांतर संगठन के लिए सक्रिय भूमिका निभाने लगे.

अरविंद घोष के भाई के बगीचे में था अड्डा, छुपाये थे हथियार व बम

वह क्रांतिकारी व दार्शनिक अरविंद घोष के भाई सिविल सर्जन बरिंद्र घोष के घर में रहते थे, मानिकतला स्थित उनका बगीचा व मकान क्रांतिकारियों का अड्डा हुआ करता था. यहां क्रांतिकारी हथियार और गोला-बारूद रखते थे. इसी बीच 30 अप्रैल 1908 को प्रफुल्लचंद्र चाकी व खुदीराम बोस के मुजफ्फरपुर में बम फेंके. उस घटना से तिलमिलायी ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों की धर-पकड़ व छापेमारी तेज कर दी. 2 मई 1908 को क्रांतिकारियों के ठिकाने पर पुलिस ने छापा मारा. पुलिस को क्रांतिकारियों की बम फैक्टरी मिली. काफी मात्रा में हथियार मिले. क्रांतिकारी अरविंद घोष, बरिंद्र घोष, सत्येंद्र नाथ (सत्येन), कन्हाई लाल समेत 35 क्रांतिकारी पकड़े गये. उन्हें अलीपुर जेल में रखा गया और मुकदमा चला.

अंग्रेजों का अत्याचार नहीं सह सका नरेंद्र, बननेवाला था गवाह

गिरफ्तार क्रातिकारियों में नरेंद्र नाथ गोस्वामी भी थे, लेकिन श्रीरामपुर के जमीनदार घराने का यह बालक अंग्रेजों का अत्याचार नहीं झेल सका और गवाह बनने को तैयार हो गया. नरेंद्र की गबाही से पूरे आंदोलन को नुकसान पहुंच सकता था. इससे सामूहिक क्षति पहुंचती. ऐसे में कन्हाई ने देश के इस गद्दार को सबक सिखाने का प्रण लिया, ताकि फिर कोई मातृभूमि के साथ दगा न करे. नरेंद्र को क्रांतिकारियों से खतरा भांप कर अंग्रेजों ने उसे अलग कोठरी में पुलिस सुरक्षा के बीच रखा था. ऐसे में उस तक पहुंचना काफी मुश्किल था.

अंग्रेज वार्डन को बेवकूफ बना गबाह को बुलवाया सामने, मार दी गोली

कन्हाई और सत्येन ने अंग्रेजों को बेवकूफ बना कर उस तक पहुंचने की योजना बनायी. सत्येन बीमार होने का नाटक करके जेल अस्पताल में पहुंच गये. वहां उन्होंने वार्डन को यकीन दिलाया कि वह व कन्हाई जेल से तंग आ गये हैं और वे दोनों भी नरेंद्र की तरह गवाह बनना चाहते हैं. इससे उत्साहित वार्डन सत्येन व कन्हाई की मुलाकात नरेंद्र से करवाने को राजी हो गया. इधर, जेल में रिवॉल्वर मंगा कर बरिंद्र ने कन्हाई को दे दी थी. अंग्रेज अधिकारी इस बात से खुश थे कि उन्हें कई गवाह मिल रहे हैं. जेल अस्पताल में जैसे नरेंद्र, सत्येन और कन्हाई के सामने आया. कन्हाई ने अपने कपड़ों में छिपाई रिवॉल्वर निकाल कर गोलियां बरसा दीं. नरेंद्र वहीं ढेर हो गया.

इस घटना ने पूरे देश में तहलका मचा दिया कि कैसे दो क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश पुलिस की आंखों के सामने अस्पताल में गवाह की हत्या कर दी. 21 अक्तूबर 1908 को कन्हाई और सत्येन को फांसी की सजा सुनायी गयी. जब जज ने पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो उन्होंने चेहरे पर मुस्कान के साथ कहा, ‘ऐसा करने का सिर्फ एक कारण था कि वह हमारे देश का गद्दार था. मैं देश के लिए फांसी खुशी खुशी कबूल करता हूं. मुझे सजा के खिलाफ कोई अपील नहीं करनी.

शवयात्रा में उमड़ी भीड़, चिताभस्म लेने को लगी बोली

केवड़ातला श्मशान घाट तक अनकी शवयात्रा में हजारों लोगों की भीड़ सड़क पर उतर गयी थी और ‘जय कन्हाईलाल’ की नारे से पूरा माहौल गूंज रहा था. अंग्रेज यह देख कर दंग हो गये थे. दाह संस्कार के बाद, कन्हाईलाल की ‘भस्म’ खरीदने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी. चिताभस्म लेने को बोली लगने लगी. कुछ उत्साही लोगों ने मुट्ठी भर भस्म के लिए उस समय पांच रुपये तक का भुगतान किया.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Adblock Detected

Please consider supporting us by disabling your ad blocker