अभिव्यक्ति

प्लेन दुर्घटना से एक दिन पहले यह हुआ था नेता जी के साथ, इस योजना की वजह से हुई दुर्घटना

 

डेस्क: भारत की आज़ादी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का अहम् योगदान रहा है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता. वह अंग्रेजों से स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में एक प्रमुख नेता थे. उनकी मृत्यु के दशकों बाद भी, उनकी मृत्यु कैसे हुई, इसका कोई निश्चित और स्पष्ट उत्तर अभी तक नहीं मिल सका है.

17 अगस्त 1945 की सुबह सुभाष चंद्र बोस अपने कैबिनेट सहयोगियों और वरिष्ठ जापानी अधिकारियों के साथ बैंकॉक से साइगॉन पहुंचे. द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया था और जापान ने मित्र राष्ट्रों को औपचारिक आत्मसमर्पण की घोषणा की थी.

उस समय नेताजी के सामने दो विकल्प थे. या तो भारत के भाग्य को ब्रिटिश सरकार को सौंप दें या अपने मिशन को पूरा करने और भारत को अंग्रेजी राज से मुक्त कराएं. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना.

नेताजी सुरक्षित स्थान की तलाश में अपने सभी साथियों के साथ सोवियत संघ जाना चाहते थे. जापानी फील्ड मार्शल तराउची ने बोस को सोवियत संघ ले जाने के लिए एक मूर्खतापूर्ण योजना बनाई. जापानी सेना के जनरल इसोदा को इस “गुप्त योजना” को अंजाम देना था.

Netaji Subhash Chandra Bose before plane crash

18 अगस्त को विमान ने उड़ान भरी

नेताजी ने इसोदा से कहा कि उनके कुछ अधिकारियों को उनकी यात्रा में उनके साथ जाने की जरूरत है क्योंकि मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत की आजादी के लिए संघर्ष जारी रखना था, न कि केवल छिपना. 11 जापानी, नेताजी और उनके खजाने के बक्से के साथ विमान 18 अगस्त को सूर्योदय के समय टौराने से उड़ान भरी और दोपहर में ताइहोकू पहुंचा.

विमान में क्षमता के अनुसार गैसोलीन भरा गया था. जापानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल शिदेई को छोड़ने के लिए टीम मंचूरिया में डेरेन की ओर जा रही थी. नेताजी शिदेई के साथ चीन के मंचूरिया क्षेत्र की राजधानी मुक्देन (शेनयांग) जाने को तैयार हो गए. विमान ने दोपहर करीब 2:30 बजे उड़ान भरी.

जैसे ही विमान ने हवा में उड़ान भरा, कुंछ ऊंचाई पर जाने के बाद एक विस्फोट की आवाज आई और उसके बाद तीन-चार तेज धमाकों की आवाज सुनाई दी. इसी के साथ विमान के टुकड़े नीचे गिर गए. कंक्रीट रनवे पर टकराने और दुर्घटनाग्रस्त होने पर विमान दो टुकड़ों में टूट गया. बाद में जब जांच की गयी तो न तो नेताजी मिले न ही उनका शव. कई लोगों का मानना है कि इस दुर्घटना से नेताजी बच गये थे और कई वर्षों तक छुपकर उन्होंने अपनी बाकी की जिंदगी गुजारी.

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