अभिव्यक्ति

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: ये बीती बात हो ना जाए

कवयित्री : अनु नेवटिया

ये बीती बात हो ना जाए

इंद्रधनुष में रंगा गगन,
फूलों से भरा चमन,
सनसन करती दक्षिणी हवाएं,
ये वादियों की सदायें।

सिंदूरी सुबह और गुलाबी शाम,
बदलते मौसम का पैगाम,
अमृतमयी नदियों की धारा,
दूर चमकता वो ध्रुव तारा।

चित्रकारिता में ही,
खो ना जाए
ये बीती बात हो ना जाए ।

पौ फटते ही पक्षियों का चहचहाना,
फूलों पर यूँ तितलियों का मंडराना,
शहद के छत्ते बिनती मधुमक्खियां,
आँगन में दाना चुगती चिड़ियाँ।

शेर जो जंगल का राजा है कहलाता,
तेंदुआ जो हिमप्रदेश में पाया जाता,
सफ़ेद बाघ और काले हिरण,
तेज़ तर्रार चीते का जीवन।

किस्से कहानियों में ही,
खो ना जाए
ये बीती बात हो ना जाए ।

खुली हवा में सांस लेना,
पेड़ों का हमें छाँव देना,
खेतों में धान की बाली ,
सब्ज़ियों की हरियाली।

औषधि भरा जंगल,
संपूर्ण मात्रा में जल,
खाद ,खनिज ,ईंधन
धरा पे जन-जीवन।

ग्रह विज्ञान में ही,
खो ना जाए
ये बीती बात हो ना जाए ।

अगर इन सबको है बचाना,
होगा कोई ठोस कदम उठाना,
कटते जंगल अब और नहीं,
‘फर’ के कम्बल अब और नहीं।

अनवीकरणीय संसाधन बचाओ,
पानी यूँ ना व्यर्थ बहाओ,
प्रदुषण हमें रोकना होगा,
वृक्ष नए रोपना होगा।

मशीनी धुंए में,
सब खो ना जाए
देर सचमुच हो ना जाए ।

अनु नेवटिया

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