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आइंस्टाइन की थ्योरी को चुनौती देने वाले महान बिहारी गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह, दुनिया ने माना था लोहा

 

डेस्क: जब गणित की बात आती है तो बिहार के प्रख्यात गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का नाम खुद ही सभी के दिमाग में आ जाता है। वशिष्ठ नारायण सिंह वह हैं जिन्होंने अपना सारा जीवन गणित को समर्पित कर दिया। पेशे से गणितज्ञ, वशिष्ठ संख्याओं और गणनाओं के मामले में बहुत प्रतिभाशाली थे।

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विश्व विख्यात गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह एक बार नासा के लिए भी काम कर चुके थे, बाद में वह फिर भारत लौट आए ताकि देश में अपनी सेवाएं दे सके।

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औसत स्कूल में हुई पढाई

बिहार में जन्मे, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व ने बिहार बोर्ड के तहत एक औसत स्कूल में किसी भी अन्य बच्चे की तरह पढ़ाई की, फिर बाद में पटना के प्रतिष्ठित साइंस कॉलेज में प्रवेश लिया और फिर अंततः अपनी आगे की पढाई के लिए कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय चले गए।

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NASA छोड़कर लौट आए भारत

यहीं पर उन्होंने अपने मुख्य विषय के रूप में गणित को चुना और फिर उसी में एमएससी किया। कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद, वशिष्ठ ने नासा (नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) में काम किया, जहाँ उन्होंने लगभग 3 वर्षों तक काम किया। लेकिन बाद में वह IIT में लेक्चरर के रूप में शामिल होने के लिए भारत लौट आए।

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मानसिक बीमारी की चपेट में आ गए

5 वर्षों तक वह कुछ शीर्ष संस्थानों जैसे IIT कानपुर, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR), बॉम्बे और भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई), कोलकाता से जुड़े रहे। हालांकि, कुछ समय बाद वह एक मानसिक बीमारी – सिज़ोफ्रेनिया की चपेट में आ गए और कुछ समय के लिए रांची में उनका इलाज चला।

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बिताया गुमनामी में जीवन

1988 में अपनी मानसिक बीमारी के चलते वह बिना किसी को बताए घर से भाग गए। 4 साल बाद वह 1992 में बिहार के सीवान इलाके में जर्जर अवस्था में मिले। तब से वह गुमनामी में जी रहे थे। उनके सराहनीय कार्य के लिए उन्हें सरकार द्वारा कभी भी मान्यता नहीं मिली है।

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आइंस्टाइन की थ्योरी को दिया चुनौती

उन्होंने आइंस्टाइन के थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के सिद्धांत को भी चुनौती दे डाली थी जिस वजह से पूरे विश्व में उन्हें पहचाना। दुनिया भर के गणितज्ञों ने वशिष्ठ नारायण सिंह का लोहा माना लेकिन पूरे जीवन काल में उन्हें वह प्रसिद्धि नहीं मिल सकी थी जिसके वह हकदार थे। 40 वर्षों तक सिजोफ्रेनिया की बीमारी झेलने के बाद अंत में 74 वर्ष की उम्र में बिहार के पटना में उनका देहांत हो गया।

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